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सूर्य देव के उपासक थे बेतिया राज के महाराजा, करवाएं थे 56मंदिरों का निर्माण..

बेतिया: बेतिया की मुख्य पहचान पोखरों और मंदिरों से होती है। बेतिया राज के महाराजाओं ने कुल 56 महत्वपूर्ण मंदिरों का निर्माण कराया। लगभग सभी मंदिरों में देवों के देव महादेव, शक्ति स्वरूपा माता पार्वती व दुर्गा के साथ-साथ भगवान सूर्यदेव महाराज की प्रतिमा स्थापित की है। 

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नगर के ऐतिहासिक सभी मंदिरों में सूर्य नारायण की स्थापित भव्य प्रतिमा यह प्रमाणित करती है कि बेतिया राज के महाराजा शिव, शक्ति व सूर्यदेव के उपासक थे। 

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महाराजाओं ने सभी मंदिरों के सामने आवश्यक रूप से पोखरे खोदवाए। यहीं कारण कई लोग बेतिया शहर को भुनेश्वर के बाद पोखरों और मंदिरों का शहर मानते है। सूर्यदेव, पोखरा से सीधा संबंध छठ पूजा से भी जुड़ा हुआ है। विद्वानों का मानना है कि बेतिया महाराज छठ पूजा उत्सव में धूमधाम के साथ शामिल होते थे। बता दें कि नगर के ऐतिहासिक कालीबाग में भगवान सूर्यनारायण की भव्य मंदिर है। जहां उनकी उपासना के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ती है। 

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नगर का ऐतिहासिक दुर्गाबाग, सागर शिवमंदिर, पिउनीबाग बसवरिया शिवमंदिर तथा लाल बाजार स्थित जोड़ा शिवालय में भी भगवान सूर्य नारायण की खुबसूरत और भव्य प्रतिमा स्थापित की गई है। जानकारों के अनुसार हर मंदिरों में सूर्य नारायण की प्रतिमा का स्थापित होना अपने आप में अनोखा है। जानकार यह भी बाते है कि सूर्य मंदिर और सूर्य नारायण की प्रतिमा बिरले ही देखने को मिलती है। बेतिया राज के हर मंदिरों में सूर्यनारायण की प्रतिमा होना यह इस मान्यता को बल देता है कि बेतिया राज के राजा-महाराजा के अलावा यहां की जनता सूर्य शक्ति और सूर्य आराधना में अटूत विश्वास रखते है।

भगवान भाष्कर ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र बनकर जगत का करते है पालन और संहार आचार्य उमेश त्रिपाठी बताते है कि हिन्दू धर्म में सूर्यदेव की बड़ी महिमा है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार सूर्य ब्रह्मा स्वरूप है, सूर्य से जगत उत्पन्न होता है और उन्हीं में स्थित है। यहीं भागवान भास्कर ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र बनकर जगत् का सृजन, पालन और संहार करते है। सूर्य नव ग्रहों में सर्व प्रमुख देवता है। 

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आचार्य सुनील तिवारी के अनुसार सूर्य देव की दो भुजाएं है। वे कमल के आसन पर विरजमान रहते है। उनके दोनों हाथ कमल से सुशोभित है। उनके सिर सुंदर स्वर्ण मुकुट तथा गले में रत्नों की माला है। उनकी कांति कमल के भीतरी भाग की सी है और वे सात घोड़ों की सवारी करते है। आचार्य मंकेश्वरनाथ तिवारी के अनुसार सूर्य देव का एक नाम सविता भी है। जिसका अर्थ है सृष्टि करने वाला। 

उन्होंने कहा कि ब्रह्मा अण्ड का भेदन कर उत्पन्न हुए तब उनके मुख से’ऊं’यह महाशब्द उच्चारित हुआ। यह ओंकार परब्रह्म है और यही भगवान सूर्यदेव का शरीर है। आचार्यों के अनुसार बेतिया राज के महाराजा शिव महिमा से भलीभांति परिचित थे। यहीं कारण था, उन्होंने मंदिरों में देवों के देव महादेव, शक्ति स्वरूपा माता पार्वती दुर्गा के साथ-साथ सूर्य देव की प्रतिमा स्थित करने में खासी रूचि रखते थे।


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