इस मामले में कुदरती धनी हैं पश्चिमी चंपारण।।

By: Md Ali

On: May 18, 2017

बेतिया: पश्चिम चम्पारण जिला प्राकृतिक जल स्त्रोतों में धनी है। जिले में नदी नालों के अलावा, चौर, मन, तालाब की अधिकता है। केवल चौर को ही लिया जाय, तो यह क्षेत्र यहां के नदी नालों से कम नहीं है। जिला मत्स्यपालन कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार यहां 4 हजार हेक्टेयर में चौर का क्षेत्र है। इसमें सर्वाधिक विस्तृत क्षेत्र चटिया चौर का है। एकेले यह चौर करीब 500 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला है। जहां मत्स्यपालन की अपार संभावनाएं हैं। यहां तालाब भी बड़ी संख्या में है। वहीं यहां का जलीय क्षेत्र मन के रूप में भी फैला है। 

इस मामले में कुदरती धनी हैं पश्चिमी चंपारण।। 1


सूबे के सबसे बड़े वनाश्रयी क्षेत्र उदयपुर के मध्य में सरैयामन अवस्थित है, जिसमें अधिक गहराई तक पानी पाया जाता है। इसके अलावा यह क्षेत्र भी काफी विस्तृत है। इसके अलावा लाल सरैया मन, अमवा मन, गहिरी मन लल सरैया मन, डुमरी मन, सेमरी मन, आदि मुख्य रूप से शामिल हैं। वहीं चौर में पिपरा चौर के अलावा लखनी चौर, परोरहा चौर, पिपरा चौर, कठैया चौर, छपैनिया चौर का अधिकांश हिस्सा पर्याप्त प्राकृतिक जल स्त्रोत का हिस्सा शामिल है।

इस जिले के नेपाल से सटे होने के कारण अधिकांश नदियां इस क्षेत्र से होकर ही बहती है। यह भी प्राकृतिक जल स्त्रोत का सबसे बड़ा हिस्सा है। यह दिगर बात है कि ग्लोबल स्तर पर जल संकट की स्थिति बन रही है। लेकिन इस जिले में जल की पर्याप्त मात्रा उपलब्ध है। यहां के अधिकांश जलीय क्षेत्र गर्मी के दिनों में भी नहीं सूखता है। जबकि अन्य जिलों में यह स्थिति नहीं है। जिले में पोखरों की संख्या भी कम नहीं है। इसमें अधिकांश पोखरों के निर्माण बेतिया राजाओं के द्वारा बनाए गए थे। इसमें जिला मुख्यालय का सागर पोखरा तालाब अति विस्तृत है।

इस मामले में कुदरती धनी हैं पश्चिमी चंपारण।। 2



यहां 15 फीट की गहराई पर ही मिल जाता है पानी..
ग्लोबल स्तर पर पानी की कमी का असर इस जिले में नहीं देखने को मिलता है। यहां का कुछ ऐसा भाग है, जहां 15 से 20 फीट पर ही पानी मिल जाता है। यह इलाका सिकटा प्रखंड का एकडरी इलाका है। दर इलाके के नाम से जाने जाने वाले इस क्षेत्र की भूमि दलदल है। यहां पानी भी आसीन से मिल जाता है। यह दिगर बात है कि गौनाहा प्रखंड का ठोरी इलाके में पानी का संकट जरूर है। यहां पहाड़ी नदियों से आने वाले पानी को छोड़ दिया जाय, तो भूजल स्तर काफी नीचा है। पठारी इलाका होने के कारण इसमें से पानी निकाला भी कठिन कार्य है। 

जानकार बताते हैं कि यहां पीने के पानी उपलब्ध कराने के लिए दूसरे जगह से टैंकर से पानी पहुंचाया जाता है। यहां लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग की ओर से लोगों को पीने के पानी की व्ववस्था की जाती है। विभाग की ओर से सोलर पंप भी लगाए गए हैं, लेकिन तकनीकी खराबी के चलते यह पंप बंद पड़ा है। ऐसे में भिखनाठोरी के निवासियों को पीने के पानी टँकर से दूसरे जगह से लाया जाता है। यहां से सटे वाल्मीकि टाइगर रिवर्ज का इलाका पानी से आच्दादित है। यहां के वन्य प्राणियों को पीने का पानी उपलब्ध कराने के लिए कई जगह वाटर होले बनाए गए हैं।
जिला मुख्यालय में साठ के दशक में बिछाई गई पाइप से होता है जलापूर्ति..
यह दिगर बात है कि प्राकृतिक जल स्त्रोत के मामले में यह जिला धनी है। लेकिन पेयजल के मामले में स्थिति बदतर बताई जा रही है। जिला मुख्यालय में ही यहां के लोग को 60 के दशक में बिछाई गई पाइप लाइन के सहारे जलापूर्ति कराई जाती है। इसमें भी कई क्षेत्र ऐसा है, जहां के लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध नहीं है। हाल में यहां के लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के लिए शहर को पांच जोन में बांटकर काम शुरु किया गया है। इसके तहत पांच जल मीनार की स्थापना की जानी है।शहर के विभिन्न वार्ड में पाइप बिछाने का काम शुरु कर दिया गया है। यह काम शीघ्र पूरा किए जाने की बात बताई जा रही है। यहां के ग्रामीण इलाकों में कई जलापूर्ति योजनाएं ध्वस्त हैं। तकनीकी खराबी एवं विद्युत की आपूर्ति नहीं होने के चलते ग्रामीण जनता को शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं होता है। यहां के पानी में आरसेनिक एवं आयरन की अधिकता है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित होता है।।

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