चंपारण रत्न से नवाजे गए रेवतीकांत दूबे।।

चंपारण रत्न से नवाजे गए रेवतीकांत दूबे।। 1

बेतिया: इतिहासकार रेवतीकांत दूबे चम्पारण रत्न सम्मान से नवाजे गए ह़ै। यह सम्मान सांस्कृतिक संगठन सुष्मा फिल्म प्रोडक्सन के निदेशक डीके आजाद ने प्रदान किया है। यह सम्मान चम्पारण के रचनात्मक विकास में महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया गया है। पूर्वी चम्पारण के मोतिहारी अवस्थित राजेन्द्र नगर भवन में आयोजित इस कार्यक्रम में कई गणमान्य मौजूद हुए और इतिहासकार को चम्पारण रत्न सम्मान से विभूषित करने में अपना योगदान दिया। बताते चले कि रेवतीकांत दूबे कई पुस्तकों की रचना कर चुके है। इनमें चम्पारण का इतिहास खाशी चर्चित हुआ। उन्होंने इस पुस्तक में चम्पारण के तमाम इतिहास को विस्तृत रूप से संजोने का महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। बरहाल उनकी अपराधी कौन शीर्षक से प्रकाशित पुस्तक सुर्खियों में है। इस पुस्तक में इतिहासकार रेवतीकांत दूबे ने भारत के पतन के जिम्मेवार तत्वों को बखुबी उजागर किया है। पुस्तक में मुख्य रूप से बताया गया है कि जब भी दुश्मनों ने देश की सरहद को लांग कर यहां की समृद्धि, सभ्यता, संस्कृति का विनाश किया इसका कारण दुश्मन नहीं बल्कि अपने ही देश के चंद गद्दार थे। उन्होंने पुस्तक में जिक्र किया है कि सोमनाथ मंदिर को लुटने की हिम्मत महमुद गजनबी को तब भी हुई सोमनाथ के ही भक्तों में से एक देश द्रोही ने उसका साथ दिया। महम्मद गोरी के विजय तभी सुनिश्चित हुई जब गद्दार जयचंद्र उसके साथ हो गया। ¨सध के राजा व राणा संग्राम ¨सह के पराजय भी भारत के चंद गद्दार के कारण ही हुई। सबसे बड़ा सवाल यह उठाया है जो काशी के चंद स्वार्थी ब्रह्मणों से जुड़ा हुआ है। उन्होंने पुस्तक में कहा है कि पापी अलावद्दीन का नाश कर माली कफूर हिन्दू धर्म का धर्म ध्वजा फैलाना शुरू कर दिया। निम्न श्रेणी के हिन्दू मुस्लिम नाम रख कर वह अलावउद्दीन का प्रधान सेनापति बना। अपने को विक्रमा दिप्तय घोषित कर काशी के ब्रह्मणों से वेदानुसार विधिपुरवक राजा भिषेक करने का का अनुरोध किया। लेकिन काशी के ब्रह्मणों ने एक अछुत को राजगद्दी पर बैठने का कोई भी अधिकार नहीं है। यह कह कर राजाभिषेक करने से इनंकार कर कर दिया। जबकि इसी काशी के चंद ब्रह्माणों ने पूर्व में अलाउद्दीन के राजाभिषेक पूरे ताम झाम से किया था।

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